Home उत्तराखंड गनीमत है ! टल गई 108 कर्मियों की हड़ताल

गनीमत है ! टल गई 108 कर्मियों की हड़ताल

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पंकज भार्गव
” बारिश के मौसम के शुरू होने से पहले राज्य सरकार करोड़ों रुपये के बजट से आपदा प्रबंधन कार्य को चाकचौबंद बनाने का हवाला देकर सुर्खियां बटोरने में लग जाती है।”

उत्तराखंड में 108 कर्मियों की 26 जुलाई से हड़ताल करने की चेतावनी बेहद डराने वाली रही। गनीमत यह रही कि बीते मंगलवार को शासन के आश्वासन के बाद यह हड़ताल टल गई। बीते दिनों राज्य के चमोली जिले में बादल फटने की घटना दहला देने वाली थी। इस आसमानी आफत को आपदा राहत और त्वरित स्वास्थ सेवा को चाकचौबंद करने की चेतावनी कहा जा सकता है। ऐसे हालातों में 108 सेवा कर्मियों की मांगों के दर्द का उठना और सरकार का लंबे समय से उनकी मांगों की अनदेखी करना दोनों को गैरजिम्मेदाराना कहना गलत न होगा।

बारिश का मौसम उत्तराखंड में बादल फटना, भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं के खतरों से भरा होने के कारण यहां जानमाल के नुकसान की संभावना और अधिक बढ़ जाती है। वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार करोड़ों रुपये के बजट से आपदा प्रबंधन कार्य को चाकचौबंद बनाने का हवाला देकर सुर्खियां बटोरने में लग जाती है। राज्य के दुर्गम और स्वास्थ सुविधा विहीन क्षेत्रों में स्वास्थ सुविधा की बात की जाए तो 108 एम्बुलेंस सेवा का शुरूआती दौर बेहद असरदार साबित रहा। 15 मई, 2008 को तत्कालीन निशंक सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई इस स्वास्थ सेवा के सायरन की गूंज पहाड़ के कोने-कोने तक सुनी जा सकती थी, लेकिन कभी इस सेवा के कर्मियों की पगार तो कभी गाड़ी के तेलपानी के पैसे न मिलने के चलते समय के साथ 108 सेवा की गाड़ी के टायर कई बार थम गए।

108 एम्बुलेंस सेवा के पूर्व के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो प्रदेशवासियों की इस सेवा पर निर्भरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। हर 12 सेकेंड में एक फोन कॉल, 5 मिनट में एक आपातकालीन केस, 12 मिनट में एक प्रसूति, 40 मिनट में एक रोड एक्सीडेंट केस और हर 12 घंटे में 108 एम्बुलेंस में एक नवजात का पैदा होना इस सेवा के समर्पण और प्रदेशवासियों के इस सेवा के प्रति विश्वास और निर्भरता को दर्शाने वाला है। आपातकालीन परिस्थितियों में प्रदेशवासियों के समक्ष जीवनदायनी बनी यह सेवा इस कदर लोकप्रिय हुई कि मात्र 6 महीने में ही पूरे प्रदेश में 108 सेवा की 90 एम्बुलेंस दौड़ने लगीं। स्वास्थ्य क्षेत्र के साथ 108 सेवा की उपयोगिता के मद्देनजर इस सेवा का लाभ अन्य क्षेत्रों में लिया जाने लगा। 2010 में हरिद्वार में आयोजित कुंभ मेले के सकुशल आयोजन में 108 सेवा का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसके अलावा 2010 में प्रदेश में आई आपदा के समय भी इस सेवा के 108 नम्बर को आपातकालीन मदद के लिए घोषित किया गया। प्रदेश के महिला आयोग, वन विभाग और पुलिस ने भी इस सेवा की महत्ता को समझते हुए आपातकालीन परिस्थितियों में त्वरित सेवाएं प्राप्त करने के लिए 108 सेवा के साथ लिखित अनुबंध किया। प्रदेश में स्वास्थ्य की दिशा में 108 सेवा की उपलब्धियों और सकारात्मक परिणामों ने पूरे देश का ध्यानाकर्षण इस ओर किया और हिमाचल सरकार ने भी 2010 में इस सेवा की शुरूआत की।

जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य कार्यक्रमों के संचालन में 108 सेवा के सराहनीय सहयोग को भुलाया नहीं जा सकता। सरकार की पहल पर 108 सेवा के माध्यम से प्रदेश के करीब 2000 सुदूरवर्ती स्वास्थ्य सेवकों को प्राथमिक चिकित्सा एवं आपातकालीन परिस्थितियों के समय प्रशिक्षण देकर तैयार किया गया। प्रदेश के 3000 से अधिक पुलिसकर्मियों, मीडियाकर्मियों और समाज के विभिन्न तबके के लोगों को प्राथमिक उपचार एवं आपातकालीन विषय पर 108 सेवा की ओर से महत्वपूर्ण जानकारियां दी गईं।

इसे विडम्बना ही कहा जा सकता है कि सरकार की अनदेखी के चलते आपदाकाल के समय 108 सेवा के कर्मी हड़ताल पर जाने की चेतावनी देते हैं जिससे लोगों में सरकार और इस सेवा के प्रति अविश्वास का पैदा होना लाजमी है।

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