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मिसाल: परिवार की आर्थिकी में मददगार बने आनन्द

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पंकज भार्गव

समावेशी आजीविका परियोजना की पहल पर दिव्यांगजनों के स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद आनन्द ने फास्टफूड का काम शुरू कर दिया है जिससे होने वाली आमदनी को वह अपने घर खर्च में लगाते हैं। अब गांव वाले भी आनन्द की मेहनत और लगन की मिसाल देने लगे हैं।

देहरादून जिले के डोईवाला ब्लाॅक में बुल्लावाला गांव के आनन्द कश्यप दिव्यांगजनों के लिए ही नहीं बल्कि आमजन के लिए भी मिसाल बन गए हैं। आर्थो व मानसिक दिव्यांगता को जीवन के सफर में काफी पीछे छोड़ चुके आनन्द को देखकर ऐसा बिल्कुल भी आभास तक नहीं होता कि वह किसी भी तरह से कमजोर या असमान्य जिंदगी जी रहे हैं। दिव्यांग समावेशी आजीविका परियोजना से जुड़ने के बाद चार बहिन-भाइयों में उम्र में सबसे बड़े आनन्द परिवार की आर्थिकी में मददगार बनकर अपने दायित्वों को बखूबी निभा रहे हैं।

आनन्द के बीते जीवन की कहानी रोमांच पैदा करने वाली है। उनकी मां सुमन ने बताया कि आनन्द के जन्म के समय उसके शरीर में किसी भी तरह की हरकत न देखकर दाई ने नकारात्मक टिप्पणी देकर उनकी खुशी को दुःख में बदल दिया था। ऐसे माहौल में आनन्द की रिश्ते की चाची आनन्द को अस्पताल लेकर गईं। डाॅक्टर के चैकअप और इलाज से आनन्द ने आंखे खोल दीं लेकिन उनके शरीर की बनावट और बातचीत का लहजा सामान्य बच्चों की तरह नहीं था।

4-5 साल की उम्र तक आनन्द की हरकतें आम बच्चों की तरह बिलकुल भी नहीं थीं। आनन्द के बारे में आस-पड़ौस के लोगों की बातें बहुत कष्ट देने वाली होती थीं पर उन्होंने ईश्वर पर आश बनाये रखी। जैसे-जैसे आनन्द बड़ा होता गया माॅं सुमन ने आनन्द को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिशों को और तेज कर दिया। दिव्यांगजनों के स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद आनन्द ने फास्टफूड का काम शुरू कर दिया है जिससे होने वाली आमदनी को वह अपने घर खर्च में लगाते हैं। अब गांव वाले भी आनन्द की मेहनत और लगन की मिसाल देने लगे हैं।

आनन्द की मां बताती हैं कि समूह की बैठकों में प्रतिभाग करने से आनन्द को अपने और अन्य दिव्यांगजनों के अधिकारों के बारे में पूरी जानकारी मिलती रहती है। गांव व समाज में कभी कमजोर समझे जाने वाले आनन्द को लोग अब पूरे सम्मान के नजरिये से देखते है और उसके विवाह के लिए रिश्ते भी आने लगे हैं।

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