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आत्मनिर्भरता की पहचान बने फुरकान

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पंकज भार्गव

देहरादून जिले में सहसपुर ब्लाॅक के शंकरपुर गांव निवासी फुरकान बचपन मंे ही पोलियो की बीमारी की चपेट में आने से दिव्यांग हो गए थे, लेकिन अपने हौसलों के दम पर फुरकान ने समाज में आत्मनिर्भरता की मिसाल कायम की है। घर पर ही सिलाई का काम कर अपने परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। फुरकान का कहना है कि मेहनत और लगन वह रास्ता है जो मंजिल तक जरूर पहुंचाता है।

फुरकान ने कहते हैं कि दिव्यांगता व्यक्ति को समाज में कमजोर नजरिये से आंका जाता है जो किसी भी मायने में सही नहीं है। उनका कहना है कि हौसलों की ताकत से कमजोर आदमी भी मनचाही मंजिल तक पहुंच सकता है। उन्होंने बताया कि बहुत छोटी उम्र में ही पोलियो बीमारी से वह आर्थो बीमारी के शिकार हो गए थे। उनके परिजनों ने कई जगह इलाज करवाया लेकिन फुरकान की शारीरिक असमानता ठीक नहीं हो पाई।

फुरकान बताते हैं कि वर्ष 2016 में उनका चयन गांव में दिव्यांगजनों को स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाने की एक परियोजना के लाभार्थी के रूप में चयनित किया गया। सिलाई के काम से अपना रोजगार शुरू करने की इच्छा रखने वाले फुरकान को परियोजना के माध्यम से सिलाई प्रशिक्षण दिलवाया गया। जिसके बाद फुरकान ने घर पर ही सिलाई का काम शुरू कर दिया। महिलाओं के सूट सिलने का फुरकान का हुनर गांव भर में सराहा जाता है। फुरकान कहते हैं कि अब उन्हें अपने दो बच्चों की पढ़ाई और घर खर्च के लिए किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ती।

फुरकान दिव्यागजनों को सिलाई प्रशिक्षण भी देते हैं। उन्होंने अपने गांव और आस-पास के क्षेत्र के दिव्यांगजनों के साथ मिलकर एक दिव्यांग संगठन भी बनाया है। उनका कहना है कि संगठन की एकजुटता से दिव्यांगजनों के अधिकारों की लड़ाई और एक दूसरे के सहयोगी बनने का सफर जारी है। भविष्य की योजना के बारे में फुरकान का कहना है कि जिला स्तर पर दिव्यांगजनों का संगठन बनाना उनका और उनके साथियों प्राथमिक लक्ष्य है।

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