Home सामाजिक सरोकार …ताकि खत्म हो सके दिव्यांगता का अभिशाप

…ताकि खत्म हो सके दिव्यांगता का अभिशाप

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हम सबका कर्तव्य है कि हम अपने आस-पास रहने वाले दिव्यांगों को उनके अधिकार दिलवाने में उनकी मदद करें। ताकि कानूनी तौर पर दिव्यांगों को मिलने वाली जो भी सुविधाएं और अधिकार उपलब्ध करवाये गए हैं उसका वास्तविक लाभ दिव्यांगों को हासिल हो सके।

हमारे देश में दुर्भाग्य से दिव्यांगों की दशा संतोषजनक तो बिलकुल भी नहीं है और न ही उनको पर्याप्त सुरक्षा ही उपलब्ध है। जहां तक उत्तराखंड राज्य की बात की जाए तो यहां हालात और भी दयनीय हैं, जिसकी दिव्यांगों के हित में कोई भी पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। दिव्यांगों को बराबरी के अवसर देना, उनके अधिकारों की सुरक्षा और उन्हें पूर्ण प्रतिनिधित्व देने के मकसद से विशेष काूनन के तहत 1995 में एक अधिनियम बनाया गया। इस अधिनियिम के तहत राज्यों से अपेक्षा की गई कि वह राज्यों के लिए विशेष रोजगार कार्यालय स्थापित करें जिसमें दिव्यांगों को नौकरी दिए जाने सम्बंधी समस्त विवरण और व्यवस्थाओं को सुनिश्चित किया जाए। इसके अलावा राज्यों को यह भी कहा गया कि अधिनियिम के तहत वह कोआॅर्डिनेशन कमेटी का गठन करें ताकि इस कमेटी के माध्यम से ऐसी योजनाओं का निर्माण किया जा सके जिससे कि दिव्यांगों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए उनका पुनर्वास किया जा सके।

दिव्यांग बच्चों को मुफ्त शिक्षा का अधिकार:

दिव्यांगजनों की सुरक्षा को लेकर बनाये गए विशेष अधिनियम के अन्तर्गत दिव्यांगों को शिक्षा देने, रोजगार देने, नौकरी में दिव्यांगों के पदों को सुरक्षित करने एवं पुनर्वास करने के लिए योजनायें बनाने आदि की व्यापक व्यवस्था की गई है। इस अधिनियम में यह स्पष्ट प्राविधान है कि प्रत्येक दिव्यांग जिसकी आयु 18 साल से कम है तो उसे निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराई जाए और सभी दिव्यांग बच्चों को निःशुल्क स्कूली पुस्तकें और शिक्षा के लिए जो भी अन्य सामग्री की जरूरत हो उसको सरकार द्वारा वहन किया जाए।

नौकरी में आरक्षण की व्यवस्था:

दिव्यांगों को रोजगार और नौकरी देने के नजरिये से देखा जाए तो विशेष अधिनियम में यह प्राविधान रखा गया है कि राज्य सरकार ऐसे पदों की शिनाख्त करे जो दिव्यांगजनों के लिए आरक्षित किए जा सकते हैं। सरकार हर तीन साल के बाद इसका पुनरावलोकन करे ओर टेक्नोलाॅजी की प्रगति को ध्यान में रखते हुए दिव्यांगों को अधिक से अधिक नौकरी देने में उनकी सहायता करे। अधिनियम में यह व्यवस्था भी की गई है कि प्रत्येक प्रतिष्ठान में कम से कम 3 फीसदी पद दिव्यांगों के लिए आरक्षित किए जाएं। राज्य का यह भी दायित्व है कि वह दिव्यांगों की खातिर विशेष रोजगार कार्यालय स्थापित करे। दिव्यांगों को नौकरी देने के सम्बंध में नियोजकों को अपनी पूर्ण क्षमता में कम से कम 5 फीसदी दिव्यांगों को रखने के लिए प्रेरित किया जाए। अधिनियम में यह भी कहा गया है कि भूमि आबंटन में विशेष रूप से दिव्यांगों का ध्यान रखा जाए।

इस प्रकार अब कानूनी तौर पर सरकार को बाध्य किया गया है कि वह दिव्यांगों की शिक्षा, पुनर्वास, रोजगार आदि का विशेष ध्यान रखते हुए उनकी सहायता हेतु उचित उपाय करे। साथ ही इस दिशा में हम सबका कर्तव्य है कि हम अपने आस-पास रहने वाले दिव्यांगों को उनके अधिकार दिलवाने में उनकी मदद करें। ताकि कानूनी तौर पर दिव्यांगों को जो भी सुविधाएं और अधिकार उपलब्ध करवाये गए हैं उसका वास्तविक लाभ उन्हें हासिल हो सके और हमारे समाज में व्याप्त दिव्यांगता का अभिशाप खत्म हो सके।
साभार: उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण

 

 

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