Home सामाजिक सरोकार … तो उजड़ते गांवों की तकदीर बदलेगा ‘शर्मा फार्मूला’ !

… तो उजड़ते गांवों की तकदीर बदलेगा ‘शर्मा फार्मूला’ !

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त्रिभुवन उनियाल
पौड़ी। उत्तराखंड में पलायन से उजड़ते गांवों और बिखरते खेतों की त्रासदी झेल रहे गांवों की तकदीर बदलने के लिए कृषि पंडित व सर्वे एक्सपर्ट विद्यादत्त शर्मा ने ’शर्मा फार्मूला’ तैयार किया है। वयोवृद्ध कृषक का दावा है कि पलायन रोकने और पर्वतीय क्षेत्रों के गांव को सरसब्ज बनाने के लिए चकबंदी जरूरी है। चकबंदी के लिए भी बेहद जरूरी है कि उसका पैमाना तय हो जो गांव-समाज की स्वीकार्यता का प्रतिनिधित्व करता हो।

शनिवार को जिलाधिकारी पौड़ी चंद्रशेखर भट्ट को इस आशय के दस्तावेज सौंपते हुए कृषि पंडित विद्यादत्त शर्मा ने सलाह दी है कि सरकार उनके द्वारा बनाए गए फार्मूले का अवलोकन कर ले। उन्होंने बताया कि उन्होंने उत्तराखण्ड के ग्रामीण परिवेश, विषम भौगोलिक परस्थिति, बिखरी खेती व बढ़ते पलायन को ध्यान में रखकर कारगर फार्मूला तैयार किया है। दावा किया कि देर-सवेर गांव बसाने के लिए सरकार को इस फार्मूले का उपयोग करना ही होगा। इसका एक कारण यह भी है कि पूरे देश में उनकी उम्र के भू-माप विशेषज्ञ अब रह नहीं गए हैं। उन्होंने उजड़ते गांव को पुर्नजीवन देने के लिए सरकार के साथ ही आम जन से भी फार्मूले का अध्ययन कर सकारात्मक पहल करने की अपील की है।

विद्यादत्त शर्मा ने बताया कि कल्जीखाल ब्लाक के गांव ही नहीं कमोवेश गढ़वाल के अधिकांश गांवों का अस्तित्व जीवनरक्षा प्रणाली के तहत खाद्यान्न सुरक्षा के सहारे अंतिम सांसे ले रहा है। वर्ष 1955 से 1966 तक उत्तराखण्ड के पर्वतीय जिलों में हुए हाल बंदोबस्त में जनपद नैनीताल, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ में चकबंदी विभाग के विभिन्न पदों के कार्यानुभव के आधार पर कम खर्चीला, सुगम व सर्वमान्य फार्मूला उन्होंने तैयार किया है। पूर्व सर्वे एक्सपर्ट ने कहा कि पहाड़ में गांव की आर्थिकी का आधार कृर्षि और उसके सहयोगी धंधे रहे हैं और भविष्य में भी कृर्षि ही एक मात्र वह माध्यम है जो असंख्य हाथों को काम और पेट के लिए अन्न दे सकता है। ऐसी मान्यता है कि 30-40 वर्षों के अंतराल में भूमि के स्वामित्व की दशा और दिशा बदल जाती है जिसके लिए भूमि का लेखा जोखा नए सिरे से तैयार किया जाता है।

आर्थिक संशाधनों के अभाव में ट्रेल द्वारा 1880 में संपादित अस्सीसाला बंदोबस्त, विकेट द्वारा 1860 में गढ़वाल में और 1868 में कुमायूं में डोरी बंदोबस्त तथा 1955 से 1966 तक हुआ हाल बंदोबस्त ही दोनों मण्डलों में समान रूप से हो सके। बाकी 1890 में गढ़वाल का प्लेन टेबल पौबंदोबस्त और 1925 से 1936 तक ऐवटसन भूमि व सरहदी बंदोबस्त मात्र गढ़वाल तक ही सीमित रह गया। कुमायू मंडल में मात्र नैनीताल जिले में ही एवटसन बंदोबस्त हो सका। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में नये सिरे से भूमि बंदोबस्त करवाना आर्थिक दृष्टिकोण से सम्भव नहीं है, इसलिए कम लागत में तात्कालिक समाधान के लिए वर्तमान हाल बंदोबस्ती माल कागजातों को आधार मानकर चकबंदी कार्यक्रम संपादित किया जाए। शर्मा फार्मूले में भूमिहीनों को भी पैतृक सेवा क्षेत्र में कृषि भूमि का कुछ अंश आवंटित करने का उपाय सुझाया गया है। चकबंदी का आधार हाल बंदोबस्त को मानते हुए चकबंदी क्षेत्र, समितियों का गठन, अधिगृहित भूमि का ब्योरा, मूल्यांकन हेतु अंको का निर्धारण, भीटे व धार का मूल्यांकन, भूमि का श्रेणीवार चिन्हीकरण, चकबंदी मूल्यांकन प्रक्रिया, दाखिल-खारिज प्रक्रिया, भूल सुधार, मूल्यांकित क्षेत्रफल को वास्तविक क्षेत्रफल में बदलने तथा वास्तविक क्षेत्रफल को वर्गमीटर में परिवर्तित करने के बाद मूल्यांकित अंक प्रतिशत की सूची तैयार करने का तरीका आदि शामिल हैं।

Key Words : Uttarakhand, Pauri, Sharma formula, Fate Destructive, Villages

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