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आस्था : भगवान कृष्ण की क्रीडा स्थली रूप में जाना जाता है सेम- मुखेम

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कुलदीप कुमार शाह

उत्तराखंड में टिहरी जिले के प्रतापनगर प्रखंड स्थित सेम-मुखेम सेम-मुखेम को भगवान कृष्ण की क्रीडा स्थली के रूप में जाना जाता है। मध्य हिमालय में स्थित इस स्थान पर साल भर बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। लोगों की आस्था है कि जब महाभारत युद्ध समाप्त हुआ तो द्वारिका भी डूबने लगी थी। जिसके बाद भगवान कृष्ण पहले रावांइ और फिर डांडा नागराजा पौड़ी आए। जब उन्हें गंगू रमोला के बारे मेंं पता चला तो वह सेम-मुखेम चले आए।

धर्मशास्त्र के अनुसार कहा गया है कि द्वापर युग में जब श्रीकृष्ण जब यहां की यात्रा पर आए थे तो उन्हें यह जगह पसंद आ गई। उस समय यहां के राजा गंगू रमोला थे और पूरी जमीन पर राजा का अधिकार था। भगवान कृष्ण ने जब यहां पर रुकने के लिए स्थान मांगा तो गंगू रमोला ने जगह देने से इन्कार कर दिया। इसके बाद कृष्ण ने यहां पर कई रूप धारण किए और गंगू रमोला की कर्इ भैंस मर गई और वह परेशान रहने लगा। जिसपर गंगू की पत्नी मैणवती ने गंगू को समझाया कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं इसलिए उनकी बात मान लो। गंगू रमोला को भी यह बात महसूस होने लगी और उन्होंने भगवान कृष्ण से क्षमा मांगी। साथ ही उन्हें जगह दे दी।

यहां पर उत्तर दिशा में सेम-मुखेम में भगवान सेम नागराजा का मंदिर बनाया गया, जिसे अब भव्य रूप दिया गया है। यह काफी रमणीक जगह है। यहां से हिमालय की पर्वत श्रृंखला साफ दिखाई देती है। पौड़ी और टिहरी के अलावा बड़ी संख्या में बाहर से भी श्रद्धालु वर्षभर यहां आते हैं। मंदिर में नैर और थुनेर की को पत्ती प्रसाद के रूप में दिया जाता है। यह काफी प्राचीन धार्मिक स्थल है।

यह धार्मिक स्थल जिला मुख्यालय से करीब 90 किमी दूर पड़ता है। पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य राकेश राणा का कहना है कि इस स्थान को पांचवां धाम के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

25 से आयोजित होगा मेला :

प्रतापनगर प्रखंड में स्थित सेम-मुखेम में हर तीसरे साल मंगशीर माह के 11 गते को विशाल मेला आयोजित होता है। मेले में सबसे पहले मुखमाल गांव की डोली जो काफी प्रसिद्ध है मंदिर के दर्शन के लिए पहुंचती है उसके बाद ही लोगों के दर्शन के लिए मंदिर के कपाट खुलते हैं।

जानकारों ने बताया कि यह मंदिर काफी प्राचीन है। बाहर के लोग भी मंदिर के दर्शन को आते हैं। यहां पर हर तीसरे साल से मेला आयोजित होता है जिसमें क्षेत्र के लोगों के अलावा बाहर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

 

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