Home सामाजिक सरोकार व्यक्तित्व : एच.एम. सिरवाई – मेहनत और काबिलियत ने दिलाई पहचान

व्यक्तित्व : एच.एम. सिरवाई – मेहनत और काबिलियत ने दिलाई पहचान

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प्रस्तुति : रोहित श्रीवास्तव, (एडवोकेट) जिला न्यायालय देहरादून

5 दिसम्बर 1906 में एक मध्यमवर्गीय पारसी परिवार में जन्में होमी, गवर्नमेंट लॉ कॉलेज मुंबई से जब पढ़ाई करके निकले तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि देश को उनके ‘अनुभव’ और शोध से ‘भारतीय संविधान’ के बारे में कॉन्सटीट्यूसनल लॉ ऑफ इंडिया ए क्रिटिकल डॉक्यूमेंट्री जैसा दस्तावेज उपलब्ध हो सकेगा।

26 साल की उम्र में 1932 में सर जमशेदजी कांगा के चैम्बर में शामिल हुए, जो की उस वक़्त एडवोकेट जनरल थे। उस वक़्त बॉम्बे हाई कोर्ट में एक से एक बेहतरीन वकील मौजूद थे जैसे सर जमशेद जी कंगा, भूलाभाई देसाईं, चिमनलाल सीतलवाड़, के. एम. मुंशी आदि जिनका बॉम्बे बार में दबदबा था। उनके परिवार में विधि व्यवसाय से किसी का कोई लेना देना नही था। ऐसे में खुद की पहचान बनाना काफी जोखिम भरा कदम था। उन्हें खुद की मेहनत और काबिलियत पर भरोसा था। लगभग 7 साल उनके लिए काफी मुश्किल भरे रहे पर वह कोशिश करते रहे। धीरे-धीरे उन्हें पहचान मिलने लगी ।

1950 में वो मौका आया जिसका उन्हें इंतज़ार था। बॉम्बे प्रोहिवेशन एक्ट 1949 पास करने पर सरकार की खूब आलोचना हो रही थी ऐसे में बॉम्बे हाई कोर्ट में सरकार अपने फैसले को बचाने के लिए कोई कसर छोड़ना नही चाहती थी। तत्कालीन मुख्मंत्री मोरारजी देसाई को होमी की काबिलियत पर भरोसा था उन्होंने तत्कालीन एडवोकेट जनरल सी.के.दिप्थारी के साथ सिरवाई को शामिल किया। सी.के. दिप्थारी सरकार का पक्ष रखने में कोई रूचि नहीं ले रहे थे क्यूंकि दिप्थारी विहस्की पीने के शौक़ीन थे। सिरवाई को इस बात का आभास था और उन्होंने उस केस पर खूब मेहनत की। ऐसे ही एक और मामले बॉम्बे लैंड रिक्येसन ऑर्डिनेंस (1947) में सीरवाई की काबिलियत को देखकर मोरारजी देसाईं को भरोसा हो गया कि सरकार के फैसलों का बचाव करने में सीरवाई सही व्यक्ति है और उन्होंने उन्हें मौका देना शुरू कर दिया। 1956 में प्राइज कम्पटीशन एक्ट (42 ऑफ 1955) को जब बॉम्बे हाई कोर्ट ने अवैध घोषित कर दिया तो राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सीरवाई को सोलिसिटर जनरल सी.के.दिप्थारी के साथ इस मामले की जिम्मेदारी दी गई।
खुशकिस्मती से सी.के.दिप्थारी की तबियत खराब हो गई और सिरवाई को मामले की पैरवी करने का मौका मिल गया। जहाँ एक ओर सी.के.दिप्थारी के नेत्रत्व में सिरवाई थे तो वही दूसरी ओर अटॉर्नी जनरल एम.सी. सीतलवाड़, सर एन. इंजिनियर, एन.ए. पालखीवाला थे. मामले में अंतर्राज्य व्यापार से लेकर गम्ब्लिंग के व्यापार, संविधान के बुनियाद अधिकार के अंतर्गत है या नही जैसे कई संवैधानिक बिंदु विचाराधीन थे। एक्ट की संवैधानिकता के समर्थन में उन्होंने अपना काम बखूबी किया।

1957 में उन्हें एडवोकेट दृ जनरल पद के लिए सरकार ने प्रस्ताव किया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। इस दौरान उन्होंने कई संवैधानिक मामलो में सरकार को सलाह दी और गलतियों पर अगाह भी किया। सरकारें आई और गई पर सिरवाई की काबिलियत पर किसी ने कोई चुनौती नही दी. वह खुद को पार्टी पॉलिटिक्स से दूर ही रखते थे लेकिन स्टेट की संवैधानिक स्तिथि लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध थे। 17 वर्षों तक वह एडवोकेट जनरल के पद पर रहे। 1971 में उन्हें अटॉर्नी जनरल के पद के लिए प्रस्तावित किया गया मगर उन्होंने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि उन्हे ब्वउउमदजंतल पर अभी काफी काम करना है। संवैधनिक मामलों में मेरी पैरवी से ज्यादा महत्वपूर्ण काम भारत की संवैधानिक और प्रशाशनिक व्यवस्था पर संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या और उनके प्रभाव का निरिक्षण ज्यादा महत्वपूर्ण है ताकि ब्वउउमदजंतल के आने वाले एडिशन में और भी बेहतर बनाया जा सके। 1974 में उन्होंने एडवोकेट जनरल के पद से इस्तीफा दे दिया।

इतने लम्बे समय तक संवैधानिक जिम्मेदारी को निभाते हुए उन्होंने भारतीय संविधान पर विस्तृत कमेन्ट्री लिखने का फैसला लिया ताकि आने वाली पीढियां संविधान को समझ सके। यह कार्य पूरा करने में उन्हें 6 वर्ष लगे और 1967 में छप कर सामने आई। जब पहला एडिशन कॉन्सटीट्यूसनल लॉ ऑफ इंडिया ए क्रिटिकल डॉक्यूमेंट्री छप कर आया तो विधि जगत में काफी प्रशंसा हुई इस मास्टरपीस की जरुरत महसूस की जा रही थी और प्रशंसा होनी भी थी उनकी पूरी जिन्दगी की मेहनत रंग ला रही थी। आज विधि जगत का शायद ही ऐसा कोई छात्र हो जिसने कॉन्सटीट्यूसनल लॉ ऑफ इंडिया ए क्रिटिकल डॉक्यूमेंट्री पढ़ने के बारे में न सोचा हो या अपनी लाइब्रेरी में लाने के लिए उसका बेसब्री से इंतज़ार न कर रहा हो।

सिरवाई साहेब अपने क्षेत्र के बेहेतरीन जानकार थे और अपने विषय पर शोध करते हुए उन्होंने तीन वॉल्यूम में कॉन्सटीट्यूसनल लॉ ऑफ इंडिया ए क्रिटिकल डॉक्यूमेंट्री के 4 एडिशन का सफलतापूर्वक संपादन किया । 25 जनवरी 1996 को उनका देहांत हो गया। उनके काम की विधि जगत में हमेशा एक महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी जो आने वाली कई पीढ़ियों के लिए लाइट हाउस की तरह दिशा निर्देशन करती रहेगी।

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