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25 जुलाई-पुण्यतिथि : श्रीदेव सुमन की शहादत पर छिड़ गया था राजशाही के खिलाफ खुला विद्रोह

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शांति टम्टा
अपनी जननी-जन्मभूमि के प्रति ऐसी अपार बलिदानी भावना रखने वाले अमर शहीद श्रीदेव सुमन का जन्म टिहरी गढ़वाल जिले की बमुण्ड पट्टी के ग्राम जौल में 12 मई, 1916 को हुआ था। इनके पिता का नाम हरिराम बड़ोनी और माता का नाम तारा देवी था। इनके पिता हरिराम बडोनी अपने इलाके के लोकप्रिय वैद्य थे। श्रीदेव सुमन ने अपने पिता से लोक सेवा और माता से दृढनिश्चय के संस्कार पैतृक रुप में प्राप्त किये थे। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा अपने गांव और चम्बाखाल में हुई और टिहरी से हिन्दी मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण की। अपने विद्यार्थी जीवन में 1930 में जब यह किसी काम से देहरादून गये थे तो सत्याग्रही जत्थों को देखकर वे उनमें शामिल हो गये, इनको 14-15 दिन की जेल हुई और कुछ बेंतों की सजा देकर छोड़ दिया गया। सन 1931 में ये देहरादून गये और वहां नेशनल हिन्दू स्कूल में अध्यापकी करने लगे, साथ ही साथ अध्ययन भी करते

सामाजिक सरोकारों से गहरा लगाव होने के चलते श्रीदेव सुमन ने पूरे राज्य में भ्रमण कर जन-जागरुकता का कार्य शुरु कर दिया। 23 जनवरी, 1939 को देहरादून में टिहरी राज्य प्रजा मण्डल की स्थापना हुई, जिसमें यह संयोजक मन्त्री चुने गये। इसी माह में जब जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद का लुधियाना अधिवेशन हुआ तो इन्होंने टिहरी और अन्य हिमालयी रियासतों की समस्या को राष्ट्रीय स्तर पर पहूंचाया। हिमालय सेवा संघ के द्वारा इन्होंने हिमालय प्रांतीय देशी राज्य प्रजा परिषद का गठन किया और उसके द्वारा पर्वतीय राज्यों में जागृति और चेतना लाने का काम किया। इस बीच लैंसडाउन से प्रकाशित ’कर्मभूमि’ पत्रिका के सम्पादन मंडल में शामिल होकर कई विचारपूर्ण लेख लिखे और बनारस में हिमालय राष्ट्रीय शिक्षा परिषद की स्थापना कर ’हिमांचल’ नाम की पुस्तक छपवाकर रियासत में बंटवाई। यहीं से यह रियासत के अधिकारियों की नजर में आ गये और रियासत द्वारा इनके भाषण देने और सभा करने पर रोक लगा दी गई। वे इससे विचलित नहीं हुये और यरवदा चक्र लेकर जनता को जागरुक करते रहे। रियासत के अधिकारियों ने इन्हें नौकरी और लाभ का भी लालच दिया, लेकिन ये उनके झांसे में नहीं आये तो इन्हें रियासत से निर्वासित कर दिया गया। कुछ दिनों बाद इनके तर्कपूर्ण विरोध के कारण इनका निर्वासन रद्द कर दिया गया।

अगस्त 1942 में जब भारत छोड़ो आन्दोलन प्रारम्भ हुआ तो टिहरी आते समय इन्हें 29 अगस्त, 1942 को देवप्रयाग में ही गिरफ्तार कर लिया गया और 10 दिन मुनि की रेती जेल में रखने के बाद ६ सितम्बर को देहरादून जेल भेज दिया गया। ढाई महीने देहरादून जेल में रखने के बाद इन्हें आगरा सेन्ट्रल जेल भेज दिया गया, जहां ये 15 महीने नजरबन्द रखे गये। इस बीच टिहरी रियासत की जनता लगातार लामबंद होती रही और रियासत उनका उत्पीड़न करती रही। टिहरी रियासत के जुल्मों के संबंध में इस दौरान जवाहर लाल नेहरु ने कहा कि टिहरी राज्य के कैदखाने दुनिया भर में मशहूर रहेंगे, लेकिन इससे दुनिया में रियासत की कोई इज्जत नहीं बढ़ सकती। इन्हीं परिस्थितियों में यह 19 नवम्बर, 1943 को आगरा जेल से रिहा हुये। यह फिर टिहरी की जनता के अधिकारों को लेकर अपनी आवाज बुलन्द करने लगे, इनके शब्द थे कि मैं अपने शरीर के कण-कण को नष्ट हो जाने दूंगा लेकिन टिहरी के नागरिक अधिकारों को कुचलने नहीं दूंगा। इस बीच इन्होंने दरबार और प्रजामण्डल के बीच सम्मानजनक समझौता कराने का संधि प्रस्ताव भी भेजा, लेकिन दरबारियों ने उसे खारिज कर इनके पीछे पुलिस और गुप्तचर लगवा दिये। 27 दिसम्बर, 1943 को इन्हें चम्बाखाल में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और 30 दिसम्बर को टिहरी जेल भिजवा दिया गया, जहां से वह जीवित बाहर न आ सके।

209 दिन टिहरी की जेल में बिताने के दौरान श्रीदेव सुमन पर कई प्रकार से अत्याचार होते रहे, झूठे गवाहों के आधार पर जब इन पर मुकदमा दायर किया गया तो इन्होंने अपनी पैरवी स्वयं की और लिखित बयान दिया कि “मैं इस बात को स्वीकार करता हूं कि मैं जहां अपने भारत देश के लिये पूर्ण स्वाधीनता के ध्येय में विश्वास करता हूं। झूठे मुकदमे और फर्जी गवाहों के आधार पर 31 जनवरी, 1944 को दो साल का कारावास और 200 रुपया जुर्माना लगाकर इन्हें सजायाफ्ता मुजरिम बना दिया गया। इस दुर्व्यवहार से खीझकर इन्होंने 29 फरवरी से 21 दिन का उपवास प्रारम्भ कर दिया, जिससे जेल के कर्मचारी कुछ झुके, लेकिन जब महाराजा से कोई बातचीत नहीं कराई गई तो इन्होंने उसकी मांग की, लेकिन बदले में बेंतों की सजा इन्हें मिली। किसी प्रकार का उत्तर न मिलने पर इन्होंने 3 मई, 1944 से अपना ऐतिहासिक आमरण अनशन शुरु कर दिया।

इसी दौरान रियासत ने यह अफवाह फैला दी कि श्रीदेव सुमन ने अनशन समाप्त कर दिया है और 4 अगस्त को महाराजा के जन्मदिन पर इन्हें रिहा कर दिया जायेगा। ऐसा प्रस्ताव सुमन जी को भी दिया गया, लेकिन सुमन जी ने कहा कि “क्या मैंने अपनी रिहाई के लिये यह कदम उठाया है। ऐसा मायाजाल डालकर आप मुझे विचलित नहीं कर सकते। अगर प्रजामण्डल को रजिस्टर्ड किये बिना मुझे रिहा कर दिया गया तो मैं फिर भी अपना अनशन जारी रखूंगा। 20 जुलाई की रात से ही उन्हें बेहोशी आने लगी और 25 जुलाई, 1944 को शाम करीब चार बजे इस अमर सेनानी ने अपने देश, अपने आदर्श की रक्षा के लिये अपने प्राणो की आहुति दे दी। इसी रात को जेल प्रशासन ने इनकी लाश एक कम्बल में लपेट कर भागीरथी और भिलंगना के संगम से नीचे तेज प्रवाह में फेंक दी।

श्रीदेव सुमन शहादत का जनता पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और उसने राजशाही के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया, इनके बलिदान के बाद जनता के आन्दोलन ने टिहरी रियासत को प्रजामण्डल को वैधानिक करार दी पर मजबूर कर दिया, मई 1947 में उसका प्रथम अधिवेशन हुआ। 1948 में तो जनता ने देवप्रयाग, कीर्तिनगर और टिहरी पर अधिकार कर लिया और प्रजामण्डल का मंत्रिपरिषद गठित हुआ। इसके बाद 1 अगस्त, 1949 को टिहरी गढ़वाल राज्य का भारत गणराज्य में विलीनीकरण हो गया।

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