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यमुनाघाटी में संरक्षण के अभाव में खण्डहर में तब्दील हो गए राजगढ़ी के भवन

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कुलदीप शाह
यमुनाघाटी के उत्तरकाशी जिले के बड़कोट में ऐतिहासिक महत्व वाले भवन सरकारी संरक्षण के अभाव में खण्डहर में तब्दील हो चुके हैं। राजशाही के दौरान कभी जिन भवनों में टिहरी के राजा का दरबार लगता था। स्थानीय लोगों का कहना है कि एक दौर ऐसा भी था जब देश ही नहीं बल्कि विदेशी सैलानी भी इस ऐतिहासिक धरोहर को देखने आया करते थे, लेकिन समय के साथ इन भवनों का संरक्षण न हो पाने के कारण ये भवन अब ढहने के कगार पर पहुंच गए हैं।

क्षेत्र के जानकारों की मानें तो टहरी रियासत काल में राजगढ़ी राजा का गढ़ हुआ करती थी। यहां राजा के सैनिकों के ठहराव के लिए विशाल कोठी के साथ ही कई अन्य भवन बने थे, जिनमें बैठकर टिहरी राजा के अधिकारी एवं मजिस्ट्रेट राज्य शासन के कार्य निपटाते थे। टिहरी नरेश जब भी रवाईं के भ्रमण पर आते थे, तो राजगढ़ी में ही उनका दरबार लगता था।

यमुना नदी के किनारे के बनाल व ठकराल पटट्टी के मध्य में राजगढ़ी एक ढालदार पहाड़ी है। राजगढ़ी से पूरी यमुना घाटी का नजारा देखा जा सकता है। नंदगांव के पास से यमुना के किनारे हरे भरे लहराते खेतों से यमुना पार राजगढ़ी पहुंचा जाता है, इस जगह का नाम राजतर है। राजगढ़ी के एक तरफ ठकराला पट्टी के फरीकोटि गंगताड़ी है। दूसरी तरफ डरव्याड़ गांव धराली मिंयाली गांव हैं। डरव्याड़ गांव में जियारा जाति के राजवंशीय राजपूत रहते हैं।

बनाल व राम सराई तक में इस जियारा जाति के लोग रहते हैं। कंडियाल गांव में एक लाखीराम वडियारी जियारा था, उसकी कई गांवों में खेती थी। पुरा ने लोग बताते हैं कि लाखीराम वक्त पड़ने पर राजा को भी कर्ज देता था। टिहरी रियासत में लार्ज लैण्ड होल्डिंग टैक्स देने वाला वह मात्र एक काश्तकार था। राजगढ़ी खुली रमणीक जगह है। यहां पर राजा सुदर्शन शाह के समय का बना भवन है। देवदार की लकड़ी से बने इस भवन पर रवाईं की शैली को उकेरा गया है। सन् 1960 के बाद इस भवन पर तहसील कार्यालय खुल गया था।

राजगढ़ी के ठीक सामने यमुना नदी के बाईं तरफ नंदगांव हैं। यह एक बड़ा राजस्व ग्राम है। इस गांव का गोविंद सिंह बिष्ट रवाईं का फौजदार था। इसी बिष्ट फौजदार ने सन् 1815 में गोरखों को सिगरोली की संधि के अनुरूप यहां से सुरक्षित टनकपुर के रास्ते नेपाल भिजवाया था। डोडड़ा क्वार में आराकोट की व्यवस्था यहीं फौजदार गोविंद सिंह देखता था। नन्द गांव के बिष्ट परिवार के लोग वरसाली से आए हैं। 30 मई 1930 को राजगढ़ी से 5 मील की दूरी तिलाड़ी ऐतिहासिक तिलाड़ी कांड हुआ था। जिसमें निर्दोष जनता पर रियासत के दीवान द्वारा गोली चलाई गई थी। 1960 में उत्तरकाशी जिला बनने पर राजगढ़ी को कोट तहसील मुख्यालय भी बनाया गया था लेकिन धीरे-धीरे रखरखाव के अभाव में अब राजगढ़ी के भवन जर्जर होकर ढह रहे हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि बेहद ऐतिहासिक धरोहर के रूप में पहचाने जाने वाले राजगढ़ी के भवन को पर्यटन की दृष्टि से भी विकसित किया जा सकता है, लेकिन विडंबना ही कहा जा सकता है कि लोगों की विरासत को संजोने की यह मांग सूबे की सरकार के कानों तक नहीं पहुंच पा रही है।

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