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भूमि के महत्व को नहीं समझ रही सरकारें

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 जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर कलम की ताकत का आगाज और आभास कराने के लिए पहचाने जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत का मानना है कि उत्तराखण्ड जैसे राज्य जहां की 80 प्रतिशत से अधिक आबादी खेती किसानी पर निर्भर रही है, में सरकार की कोई भूमि सुधार और प्रबंधन नीति न होने के कारण बड़े पैमाने पर पलायन के चलते पहाड़ी क्षेत्र तेजी से जनविहीन हो रहे हैं। लोग अपनी पुस्तैनी जमीन छोड़ कर मैदानों में गुरुबत की जिन्दगी जीने का मजबूर हैं। प्रस्तुत है भूमि के महत्व को लेकर सरकारों की नासमझ सोच को दर्शाता उनका एक नवीनतम लेख -ः

महाभारत युद्ध को रोकने के अंतिम प्रयास के तौर पर जब श्रीकृष्ण कौरव पाण्डवों के बीच सुलह के लिये दुर्योधन के पास गये तो उस युद्धोन्मादी युवराज का कहना था कि ”सूचेकम मेव दस्यामि बिना युद्धेन केशवः“। मतलब यह कि हे केशव! बिना युद्ध के मैं पाण्डवों को सुई के नोक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा। जाहिर है कि पाण्डवों को उस समय थोड़ी सी जमीन अपने अस्तित्व के लिये मिल जाती तो उतने बड़े युद्ध से उतना महाविनाश नहीं होता। इस धरती पर जमीन वह प्राकृतिक संसाधन है जिसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यही कारण है कि युगों-युगों से शक्तिशाली और असरदार लोग जमीनों पर अधिपत्य जमाते रहे और सर्वाधिक ताकतवर स्वयं को शासक घोषित करते रहे, लेकिन बिडम्बना यह है कि हमारी सरकारें भूमि के इस महत्व को समझ कर व्यवहारिक नीति बनाने के बजाय मुंह छिपाती रहीं हैं।
नन्दीग्राम, सिंगूर और भट्टा परसौल हो या ग्वालियर के भूमिहीन आदिवासियों से जमीन छीनने का सवाल। जब तक सरकार या धन्नासेठ विकास के नाम पर आम लोगों के पावों तले की जमीन को हड़पने की नीयत से गुरेज नहीं करेंगे तब तक जमीन के सहारे से वंचित लोगों का गुस्सा फूटता रहेगा। उत्तराखण्ड में भी तराई में बाहरी लोगों ने वहां के मूल निवासी थारू और बोक्सों की जमीनें हड़प कर उन्हें उन्हीं की जमीन पर कृषि मजदूर बना दिया है और पहाड़ों में विकास के नाम पर जमीन छीनी जा रही है। पहाड़ों में भूमि उपयोग और प्रबंधन की कोई नीति न होने के कारण पहाड़ जनविहीन हो रहे हैं।
उत्तराखण्ड जैसे राज्य जहां की 80 प्रतिशत से अधिक आबादी खेती किसानी पर निर्भर रही है, में सरकार की कोई भूमि सुधार और प्रबंधन नीति न होने के कारण बड़े पैमाने पर पलायन के चलते पहाड़ी क्षेत्र तेजी से जनविहीन हो रहे हैं। लोग अपनी पुस्तैनी जमीन छोड़ कर मैदानों में गुरुबत की जिन्दगी जीने का मजबूर हैं। एक सरकारी सर्वे के अनुसार उत्तराखण्ड राज्य बनने के समय वर्ष 2001 में जहां प्रदेश में कृषि क्षेत्र 7 लाख 70 हजार हेक्टेयर था। जो 2007-08 में 7 लाख 55 हजार हेक्टेयर रह गया। 2008-09 में 7 लाख 53 हजार, 2009-10 में 7 लाख 41 हजार, 2010-11 में 7 लाख 23 हजार और 2011-12 में यह 7 लाख 14 हेक्टेयर रह गया। प्रदेश में हर वर्ष कृषि भूमि में कमी आ रही है। कृषि क्षेत्र सिमटने के साथ ही फसलों का बुवाई क्षेत्र में सिमट रहा है। वर्ष 2011-12 में 6 लाख 61 हजार हेक्टेयर में खरीफ की फसल की बुवाई की गयी थी। जोकि 2012-13 में 5 लाख 30 हजार हेक्टेयर रह गयी। जबकि 2013-14 में यह 4लाख 97 हजार हेक्टेयर ही रह गयी है। घटे कृषि क्षेत्र का मुख्य कारण पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन को माना जा रहा है। प्रदेश में 2010-11 के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 9,12,650 कृषि जोतें थी, जिनमें से 8,29,468 जोतें लुघ एवं सीमान्त कृषकों की हैं, जो कुल जोतों का 91 प्रतिशत है। लेकिन पर्वतीय क्षेत्रांे में पलायन के कारण हजारों की संख्या में जोतों ही गायब हो चुकीे हैं। प्रदेश में कुल कृषि क्षेत्र का लगभग 56 प्रतिशत भाग पर्वतीय क्षेत्र मे अंतर्गत आता है। पर्वतीय क्षेत्रों में भोगौलिक कारणों से भी कृषि भूमि में कमी आ रही है। बादल फटने, अतिवृष्टि और भू-स्खलन से भी कृषि क्षेत्र प्रभावित हो रहा है। बादल फटने से किसानों की पूरी की पूरी जोत ही खत्म हो जाती है। जिसके कारण भी पर्वतीय किसान कृषि से मुंह मोड़ रहे हैं। भौगोलिक कारणों से एक बार फसल चौपट हो जाने के कारण किसान की कमर टूट जाती है फिर वह दोबारा खेती करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है और पलायन कर जाता है। वहीं मैदानी क्षेत्रों में औद्योगीकरण और लगातार आसमान छूते ज़मीन के भाव के कारण लोग खेती करने के बजाय खेत बेचने में फायदा मान रहे हैं। उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में जहां लोग स्वेच्छा से भी भूमिहीन हो रहे हैं वहीं मैदानी और जनजातीय इलाकों में लोगों की जमीनों पर न केवल सरकार बल्कि धन्नासेठों और आक्रामक बाहरी लोगों की गिद्धदृष्टि लगी हुयी है।
दुनियां में अफ्रीका के बाद आदिवासियों की सर्वाधिक आबादी भारत में है। भारत में इनकी आबादी लगभग 8 प्रतिशत आंकी गयी है, लेकिन इस उपमहाद्वीप के ये सबसे प्राचीन या मूल निवासी ज्यादातर भूमिहीन हैं। भूमिहीन होने का प्रमुख कारण इनका आखेटक-संग्रहक और घुमन्तु स्वभाव रहा ही है, लेकिन स्वयं को मुख्यधारा के सभ्य कहलाने वाले साधन सम्पन्न लोग भी इनकी जमीनें हड़पने में पीछे नहीं रहे। जिस मानव समुदाय के पावों तले जमीन न हो, उसकी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति की कल्पना स्वतः ही की जा सकती है। देखा जाय तो यह भूमिहीन मानव समुदाय भविष्य का एक बारूद का ढेर ही है। भारत सरकार तथा कई राज्य सरकारें आज घरेलू मोर्चे पर नक्सलवाद के सबसे भयावह मोर्चे पर जूझी हुयी हैं। नक्सलवाद की जड़ें 9 राज्यों के 170 जिलों तक काफी गहराई तक पहुंच चुकी हैं। आदिवासी एवं भूमिहीन लोग नक्सलियों के कैडर का सबसे अहम् हिस्सा होते हैं। कॉम्पैक्ट रिवोल्यूशनरी ज़ोन (सीआरजेड) के नाम से मशहूर रेड कॉरिडोर नेपाल से शुरू होकर भारत के कुछ सबसे पिछड़े इलाक़ों तक फैला हुआ है। इसमें बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और महाराष्ट्र के कुछ इलाके शामिल हैं।

इतिहास गवाह है कि कि सत्ताधरियों ने जब भी इन भोले भाले लोगों पर ज्यादतियां कीं, इन्होंने पूरी ताकत से उसका जबाब दिया है। सन् 1817 में भीलों ने खान देश पर आक्रमण किया और वह आंदोलन 1824 में सतारा और 1831 में मालवा तक चला गया। सन् 1846 में जाकर अंग्रेज इस विद्रोह पर काबू पा सके। डूंगरपूर में ललोठिया तथा बांसवाड़ा, पंचमहाल (गुजरात) में गोबिंद गिरी ने धार्मिक आंदोलन चलाए। सन् 1812 में गोबिंद गिरी को अंगेजों ने गिरफ्तार कर लिया। उड़ीसा में ‘मल का गिरी’ का कोया विद्रोह सन् 1871-80 में हुआ। फूलबाने का खांडे विद्रोह (1850) में तथा साओरा का विद्रोह (1810-1940) में हुआ। ये विद्रोह आर्थिक शोषण के कारण हुए। सन् 1853 में संथाल-विद्रोह हुआ। सन् 1895 में मुंडा विद्रोह हुआ। सन् 1914 में उंरावों का ताना-मगत विद्रोह हुआ। मिजो आंदोलन लंबे समय तक चला और लालडेंगा मुख्यमंत्री बने। तराई में बाहरी दबंगों ने जनजातियों की जमीनें कब्जा रखी हैं और मूल निवासी अपने ही खेतों पर मजदूरी करने को विवश हैं। खटीमा के फुलैया गांव में जमीनों को लेकर 2011 में हिंसा की शुरुआत हो चुकी है। इन जनजातीय क्षेत्रों में धुर वाम पन्थियों या माओवादियों की सक्रियता की सम्भावनाऐं बढ़ती जा रही हैं। सन् 1967 में नक्सलवाद की बुनियाद पश्चिम बंगाल के नक्सलवाड़ी गांव में संथाल आदिवासी किसानों के सशस्त्र विद्रोह से पड़ी थी।

विश्व की कुल उपलब्ध जमीन का मात्र 2.3 प्रतिशत हिस्सा ही भारत के पास है जिस पर दुनियां की 18 प्रतिशत आबादी का भार है। नेशनल ब्यूरो आफ सोयल सर्वे एण्ड प्लानिंग के एक अनुमान के अनुसार भारत की कुल जमीन में से 146.5 मिलियन हैक्टेअर अवक्रमित या डिग्रेडेड है। आजादी के बाद भूमि संसाधन के बारे में विचार करने के लिये जे.सी. कुमारप्पा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। समिति की रिपोर्ट में व्यापक कृषि सुधार के उपायों की सिफारिशें की गयीं थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा था कि देश में जमीन कुछ शरमायेदारों के हाथों में कैद है, और वे उस जमीन को जोतने वालों का शोषण करते हैं। यही नहीं समिति ने जमीन के रिकार्ड बेहद खराब हैं जिनकी दुर्दशा पर सुप्रीम कोर्ट ने भी चिन्ता जताई है। रिकार्ड ठीक न होने और कुप्रबन्धन के कारण लोगों का ज्यादातर समय और शक्ति मुकदमेबाजी पर बर्बाद हो रहा है।  तब से लेकर आज तक न तो भूमि के रिकार्ड सही हुये और ना ही प्रबन्धन के कारगर तरीके इजाद किये जा सके। उत्तराखण्ड का तराई क्षेत्र इसका उदाहरण है जहां बाहरी लोगों ने मूल निवासी थारू और बोक्सा की जमीनें हड़प ली हैं और राज्य सरकार जमीनें हड़पने वालों को पूरा संरक्षण दे रही है।

भारत में भूराजस्व वसूली के लिये भूप्रबन्धन की शुरूआत अकबर बादशाह के जमाने में राजा टोडरमल ने की थी। मुगलों के बाद अंग्रेज और उनके अधीन रहे नबाब और रियासती राजा भी राजस्व वसूली के लिये ही भूमि रिकार्ड रखते थे। बहरहाल आजादी के बाद लोकोपयोगी भूप्रबन्धन की बारी आयी। स्वतंत्र भारत का पहला भूमि सुधार कानून 1950 में उत्तर प्रदेश में बना जिसका नाम उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम आया। इस अधिनियम के बाद सदियों से कुण्डली मारे बैठे पुराने जमींदारों की जमींदारी तो कुछ हद तक जमींदोज हो गयी, मगर उनकी जगह नेताओं, नौकरशाहों, नव धनाड्यों उद्योग घरानों और फिर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नयी जमींदारियां शुरू हो गयी। बिहार जैसे राज्यों में जमींदारी बचाने के लिये रणवीर सेना जैसी निजी सेनाओं का भी उदय हुआ तो अन्य राज्यों में भूमाफिया, राजनेताओं और भूव्यवसाइयों ने गुण्डों की फौज खड़ी करनी शुरू कर दी। नेताओ, गुण्डों नौकरशाहों और पुलिस के गठजोड़ के कारण आज माफिया, प्रोपर्टी डीलर या रियल एस्टेट और सरकार में फर्क करना मुश्किल हो गया है।

देश भर में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ जो आंदोलन चलते रहे हैं उनका समाधान भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव के बगैर नहीं किया जा सकता है, और ऐसा कानून बिना भूमि की वास्तविक स्थिति जाने सम्भव नहीं है। इस मामले में हरियाणा के अलावा अन्य राज्यों में अंग्रेजों द्वारा 1894 में बनाये गये भूमि अधिग्रहण कानून के तहत जमीनें हासिल की जा रही हैं। अगर किसान की जमीन हासिल करने में जनता द्वारा चुनी गयी सरकारें अंग्रेजों शासकों की तरह व्यवहार करे तो फिर किसान आग बबूला क्यों नहीं होगा। जमीन अधिग्रहण को लेकर हरियाणा सरकार के फार्मूले को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाने की मांग जोर पकड़ने लगी है। इस फार्मूले के तहत औद्योगिक या बुनियादी क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए जो जमीन ली जाती है उसके लिए बाजार भाव पर मुआवजा दिया जाता है। किसानों को पूरी राशि एक बार में नहीं दी जाती, बल्कि हर वर्ष उन्हें रायल्टी दी जाती है। इसके साथ ही रोजगार की गारंटी मिलती है। पद्मभूषण चण्डी प्रसाद भट्ट कई बार उत्तराखण्ड सरकार से हरियाणा के फार्मूले को लागू करने की लिखित और मौखिक सलाह दे चुके हैं, मगर उनकी सलाह भी नक्कारखाने में चली जाती है।

जमीन, मिट्टी का टीला नहीं बल्कि धरती का हिस्सा होती है। इस धरती पर जमीन ही जीवन का सबसे बड़ा आधार है। जमीन के बिना आप कुछ भी नहीं कर सकते हैं। इसीलिये जमीन और आधार या बुनियाद को पर्यायवाची माना जाता है। जमीन धरती का हिस्सा है और धरती जीवन की जननी है। हम इसी धरती में पैदा होते हैं और इसी धरती में विलीन हो जाते हैं। ऐलेक्जेण्डर द ग्रेट या हिटलर से लेकर सद्दाम हुसैन तक सब आ कर चले गये मगर जमीन यहीं की यहीं रह गयी। इतने महत्वपूर्ण संसाधन के लिये अगर किसी देश के पास कोई सुविचारित नीति और प्रबन्धन का व्यवहारिक नजरिया नहीं है, तो समझो कि उसके पास कुछ भी नहीं है। भूमि प्रबन्धन के आधार पर दुनियां की सभ्यताऐं बनती और बिगड़ती रही हैं। एक किसान के पास उसकी जो जमीन होती है और वह धरोहर आगे की कई पीढ़ियों तक चलती है। उस जमीन को बेच कर हासिल किये गये रुपये जल्दी ही खर्च हो जाते हैं। अतः हमें समझ लेना चाहिये कि अगर आप किसी किसान की जमीन खरीद या हड़प रहे हैं तो उसकी भावी पीढ़ियों के जीने का सहारा छीन रहे हैं। भूमि वह संसाधन है जिसे खींच तान कर बढ़ाया नहीं जा सकता।

जयसिंह रावत,
ई-11फ्रेंण्ड्स एन्क्लेव, शाहनगर
डिफेंस कालोनी रोड,
देहरादून।
मोबाइल- 09412324999
jaysinghrawat@gmail.com

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